पद्यमय नमन
सत्पुस्र्ष: श्री प्रमोद ग्रोवर:
-शास्त्री नित्यगोपाल कटारे
दक्ष: मोद-प्रमोदे च धीमानव्यग्रो वर:।
आसीच्छान्तश्च पुण्यात्मा श्रीमत्प्रमोद ग्रोवर:।।
विवेक विनयी वीर: विधिवेत्ता च वाक्पटु:।
सद् व्यवहारेण विख्यात: मित्रेषु स जनप्रिय:।।
संगीतस्य सभायां च अत्र साहित्य गोष्ठिषु।
प्रवचनेsध्यात्मिके चास्य भवत्यासीदुपस्थिति:।।
सत्पुस्र्षोsयं सदाचारी सत्संग-सत्यप्रिय:।
कुर्वन् सामाजिकीं सेवां कीर्तिं भूतिं च लब्धवान्।।
सुमन: सुप्रिया वाणी अस्यासीत् सुन्दरं वपु:।
सर्वांगीण-विकासस्य एष: आदर्श-मानव:।।
एष: बहुकाल पर्यन्तं संस्मरणीय: भविष्यति।
जीवित यश: शरीरेण अद्यापि स्वराजपति:।।
-शास्त्री नित्यगोपाल कटारे
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रेवा की लहरें तुम्हें करती हैं अब याद
-हुकुमपाल सिंह 'विकल'
ग्रोवर श्री प्रमोद जी का व्यक्तित्व अनूप।
सहज सरल सुन्दर सुखद, ज्यों जाड़े की धूप।।
बाहर से जितना सुगढ़, भीतर उतना रम्य।
संघर्षों को समर्पित, साहस अजित अदम्य।।
भाव भरा अन्तस अलस, भावुक भावातीत।
बजता था हर साँस में, जीवन का संगीत।।
गायन वादन शास्त्र के पंडित परम प्रमोद।
या जिनके अन्तस भरा, सात स्वरों का बोध।।
जिनकी वाणी में मधुर, बोल बड़े अनमोल।
पड़ते थे जिस कान में देते मिश्री घोल।।
सत्य शील सद्भाव की, थे वे सच्ची मूर्ति।
देते रहे समाज को सदा नई स्फूर्ति।।
मिला स्वराज था नेह का, पा स्वराज का हाथ।
ऐसी पावन प्रीति का, छोड़ गए क्यों साथ।।
जोड़ी थी कितनी सुघड़, सुन्दर सहज सुबोध।
दोनों ओर स्वराज था, दोनों ओर प्रमोद।।
मीरामयी स्वराज का, अन्तस बहुत पवित्र।
अंकित था जिसमें स्वयं, श्री प्रमोद का चित्र।।
दोनों का जीवन रहा सदा समर्पण हेतु।
जीवन भर सद्भाव का, रहे बाँधते सेतु।।
उन्तिस बारह चार को ऐसा आया काल।
छीन ले गया हाथ से ग्रोवर को तत्काल।।
गए छोड़ संसार तुम, गए राम के धाम।
बंधु तुम्हारे नाम को, बारम्बार प्रणाम।।
जिनकी साँसों में बसा, सदा हुशंगाबाद।
रेवा की लहरें तुम्हें, करती हैं अब याद।।
तुम प्रतीक सद्भाव के मानवता के धाम।
इसी तरह हर रूप में तुमको रााखे राम।।
स्मृतियों का दीप जो, छोड़ गए हैं आप।
उसी ज्योति में ढोयेंगे, हम अपना अभिशाप।।
तुम स्वराज घर द्वार पर रखना अपनी प्रीत।
हृदय हृदय घुलता रहे, जीवन का संगीत।।
हम अपनी श्रृद्धांजलि, आदर सहित अपार।
अर्पित करते आपको, स्वीकारें साभार।।
युग युग तक बिखरी रहें, तात तुम्हारी गंध।
आँगन में उगते रहें, जीवन के रस छन्द।।
-हुकुमपाल सिंह 'विकल'
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गर्वीले हिमालय से
-र्प्रो.डॉ.शरद नारायण खरे
सरल-सहज पर मिलनसार थे, रौबीले थे ग्रोवरजी,
स्वाभिमान की पूरी गठरी, गर्वीले थे ग्रोवर जी।
सदा बहुत कम बोला करते, सारा शहर प्रशंसक था,
सुनकर तारीफें, शरमाते, शर्मीले थे ग्रोवरजी।
आन की खातिर अड़ जाते थे, कभी कोई परवाह नहीं।
नगर-मुहल्ले की इज्जत थे, हठ्ठीले थे ग्रोवर जी।
स्वार्थ, कपट, की बातें हों या, व्यर्थ-निरर्थक झगड़े हों,
हर अवगुण में बाधक थे, और इक टीले थे ग्रोवर जी।
हर जवान के अभिभावक थे, कथा-कहानी बच्चों की
सब पर खुलकर प्यार लुटाते, अपनीले थे ग्रोवर जी।
तेज थिरकता था चेहरे पर, वाणी में भारीपन था,
दिखने में तो थे कठोर, पर अति गीले थे ग्रोवर जी।
परंपराएँ, रीति-रिवाजों, सबके पक्के हामी थे,
पाप-अनीति देख बिगड़ते, भड़कीले थे ग्रोवर जी।
इंसां की सेवा में तत्पर, मानवता पथ राही थे,
आलोक खिलेगा यही सोच था, सपनीले थे ग्रोवर जी।
संस्कार उनको हितकर थे, भारतीयता उनको प्रिय,
ऊपर से मॉडर्न वो दिखते थे, पर पीले थे ग्रोवर जी।
जग सुधरेगा यही लक्ष्य था, पीकर गरल सुधा देते,
शिव-शंकर, त्रिपुरारी थे वो, सच नीले थे ग्रोवर जी।
दृढ़-निश्चय, संकल्प के धनी, मजबूत इरादों वाले थे,
दृढ़ता की दीवार में गड़ा, इक कीले थे ग्रोवर जी।
-प्रो० डॉ॰ शरद नारायण खरे, मण्डला
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1 Comments:
ग्रोवर जी के सम्बन्ध में संस्कृत और हिन्दी में इतनी सुन्दर भाव पूर्ण कविता लिखी जा सकती है। ऐसे समाजसेवी व्यक्ति के लिए मेरी विनम्र श्रद्धांजलि। लोकहित में इण्टरनेट का इतना अच्छा उपयोग पहली बार देख रहा हूँ।
राजेश अरोरा, चण्डीगढ
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